Monday, July 16, 2007

A closer examination of facts reveals the truth...

Last week many papers including Indian Express reported about Naxals killing farmers in defiance of their "ban on farming".A closer examination of facts reveals the truth...


Shubhranshu Choudhary Freelance JournalistPh : + 91 98110 66749 e mail : smitashu@gmail. comhttp://36garh. notlong.com http://www.cgnet. in


...पर झूठ भी तो नहीं लिख सकते


पिछले हफ्ते दिल्ली के अखबारों में एक चौंकाने वाली खबर छपी। खबर रायपुर से थी और उसमें इंडो एशियन न्यूज़ सर्विस के हवाले से लिखा था कि नक्सलियों ने पूरे बस्तर में खेती न करने का फरमान जारी किया हुआ है और उस आदेश की अवहेलना करने पर बीजापुर क्षेत्र में 3 आदिवासी किसानों कीहत्या कर दी गयी है ।


आजकल बस्तर में नक्सलियों का जो रवैया चल रहा है उससे किसी भी खबर से आश्चर्यचकित होने की कोई बात नहीं है और जब मैंने अपने मित्रों को यह खबर दिखाई तो उन्होंने भी कहा "जब गीदड की मौत आती है तो वो कुछ ऐसा ही करताहै" ।मुझे लगा कि गलत ही सही पर अक्सर मेरे बारे में यह आरोप लगते रहते हैं कि मैं नक्सलियों के विरोध में कुछ नहीं लिखता तो मुझे इस विषय पर ज़रूर लिखना चाहिये ।



खबर में मृत किसानों के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गयी थी सिर्फ इतना लिखा था कि 3 अलग अलग घटनाओं में 3 किसान मारे गये हैं । यह खबर पुलिस सूत्रों के हवाले से लिखी गयी थी ।मेरी पत्रकारिता की ट्रेनिंग कहती है कि किसी भी विषय पर लिखने से पहले दोनो पक्षों से बात करना ज़रूरी है । जब आप दैनिक अखबार या न्यूज़ सर्विस के लिये काम करते हैं तो कई बार जल्दबाज़ी में दोनों पक्षों का बयान लेना संभव नहीं होता और पत्रकारों को एक ही सूत्र से मिली खबर को भी लिखनापडता है ।



पर दैनिक में काम करने वाले मित्रों से अलग मैं तो क़ोलम लिख रहा हूं और वह भी घटना के कुछ हफ्तों बाद । इसलिये यदि इस कहानी के दूसरे पक्ष यानि नक्सलियों का बयान न भी मिले तो भी मुझे एक और सूत्र से इस खबरकी सच्चाई को तो टटोलना ही चाहिये ।मैंने बस्तर में कुछ मित्रों को फोन किया ।



पहले मित्र ने बताया "नहीं खेती का काम तो यहां पूरे ज़ोरों पर है और आप जो खबर बता रहे हो वैसा तो कुछ नहीं है । बल्कि नक्सलियों ने तो किरन्दुल में पिछले दिनों यह पर्चा छोडा था कि जो भी कैम्प छोडकर खेती करने आयेगा उसे पूरी सुरक्षा दीजायेगी, आखिर नक्सली तो यही चाहते हैं कि लोग कैम्प छोडकर गांवों में आएं " ।



मुझे लगा कि शायद मित्र तक यह नई जानकारी अब तक पहुंची नहीं है क्योंकि खबर में यह लिखा था कि नक्सलियों ने यह फरमान पिछले महीने की आर्थिक मैंने कुछ और मित्रों को फोन किया । पर आश्चर्यजनक रूप से उन्होंने भी वही कहानी बताई ।इस मित्र की कहानी थोडी अधिक विश्वसनीय थी क्योंकि उन्होंने मुझे अपने तर्क का कारण भी समझाया ।


ये मित्र पत्रकार नहीं हैं और सरकार के साथ काम करते हैं। उन्होंने बताया "आजकल हम सरकारी योजनाओं के बारे में बताने के लिये जिले के विभिन्न हिस्सों में जन प्रतिनिधियों की बैठक कर रहे हैं और हमारी पिछले हफ्ते 6 जुलाई की बैठक में कोई भी पंच या सरपंच इसलिये नहीं आया क्योंकि सारे लोग खेती में व्यस्त हैं।


आप जो कहानी बता रहे हैं उसे मैंने स्थानीय अखबारों में पढा है पर मैंने अपनी सुदूर गांवों की यात्राओं में भी ऐसा कुछ नहीं पाया है। हां पिछली यात्रा में मैंने एक अजीब नज़ारा ज़रूर देखा जिसके बारे में मैं आपको बताना चाहूंगा । मैंने देखा कि बस्तर में आजकल बंदूक के साये में खेती हो रही है । सडक किनारे खेतों में कैम्पों में रहने वाले आदिवासी खेती कर रहे हैं और पुलिस उनको पहरा दे रही है ।




पर आप यदि कह रहे हैं कि ऐसे आदिवासी जो कैम्पों में नहीं रह रहे हैं और उनको नक्सलियों ने खेती करने से रोका है तो हमारे इंटीरियर इलाकों में काम करने वाले कर्मचारियों को भी ऐसी कोई जानकारी नहीं है" ।मैं अब और भी परेशान हो गया कि आखिर इस खबर को कंफर्म कैसे करें ।इस बीच इंडियन एक्सप्रेस में भी एक और खबर छप गई । यह खबर भी रायपुर से थी । इस खबर में यह लिखा था कि इस हफ्ते नक्सलियों ने खेती न करने का फरमान न मानने के कारण दो और किसानों को मार दिया है। इस खबर में मेरे लिये एक अच्छी बात यह थी कि इसमें मारे गये दोनों व्यक्तियों के नाम और उनके गांव के नाम भी लिखे थे जिससे मैं उनके परिवार या गांव वालों से सम्पर्क कर सकूं ।मैंने अपने मित्रों को फिर फोन किया ।


मैंने उनसे कहा कि अब मेरे पास इस हफ्ते मारे गये दो किसानों के नाम हैं और पीडित परिवार के किसी से नहीं तो कम से कम मुझे उस गांव के कुछ लोगों से बात करा दीजिये ।उन्होंने बताया चिंतागुफा गांव सडक से काफी अंदर है और वहां संभवत: कोई फोन तो नहीं होगा पर हम कोशिश करते हैं और उन मित्रों का धन्यवाद कि कुछ दिनों बाद उन्होंने पीडित परिवार तो नहीं पर चिंतागुफा के कुछ ग्रामीणों]



नाकेबंदी के बाद जारी किया है ।मैंने कुछ और मित्रों को फोन किया । पर आश्चर्यजनक रूप से उन्होंने भी वही कहानी बताई ।
इस मित्र की कहानी थोडी अधिक विश्वसनीय थी क्योंकि उन्होंने मुझे अपने तर्क का कारण भी समझाया । ये मित्र पत्रकार नहीं हैं और सरकार के साथ काम करते हैं।



उन्होंने बताया "आजकल हम सरकारी योजनाओं के बारे में बताने केलिये जिले के विभिन्न हिस्सों में जन प्रतिनिधियों की बैठक कर रहे हैं और हमारी पिछले हफ्ते 6 जुलाई की बैठक में कोई भी पंच या सरपंच इसलिये नहीं आया क्योंकि सारे लोग खेती में व्यस्त हैं। आप जो कहानी बता रहे हैं उसे मैंने स्थानीय अखबारों में पढा है पर मैंने अपनी सुदूर गांवों की यात्राओं में भी ऐसा कुछ नहीं पाया है। हां पिछली यात्रा में मैंने एकअजीब नज़ारा ज़रूर देखा जिसके बारे में मैं आपको बताना चाहूंगा । मैंने देखा कि बस्तर में आजकल बंदूक के साये में खेती हो रही है ।


सडक किनारे खेतों में कैम्पों में रहने वाले आदिवासी खेती कर रहे हैं और पुलिस उनको पहरा दे रही है । पर आप यदि कह रहे हैं कि ऐसे आदिवासी जो कैम्पों मेंनहीं रह रहे हैं और उनको नक्सलियों ने खेती करने से रोका है तो हमारे इंटीरियर इलाकों में काम करने वाले कर्मचारियों को भी ऐसी कोई जानकारी नहीं है" ।मैं अब और भी परेशान हो गया कि आखिर इस खबर को कंफर्म कैसे करें ।



इस बीच इंडियन एक्सप्रेस में भी एक और खबर छप गई । यह खबर भी रायपुर से थी । इस खबर में यह लिखा था कि इस हफ्ते नक्सलियों ने खेती न करने का फरमान न मानने के कारण दो और किसानों को मार दिया है। इस खबर में मेरेलिये एक अच्छी बात यह थी कि इसमें मारे गये दोनों व्यक्तियों के नाम और उनके गांव के नाम भी लिखे थे जिससे मैं उनके परिवार या गांव वालों से सम्पर्क कर सकूं ।


मैंने अपने मित्रों को फिर फोन किया । मैंने उनसे कहा कि अब मेरे पास इस हफ्ते मारे गये दो किसानों के नाम हैं और पीडित परिवार के किसी से नहीं तो कम से कम मुझे उस गांव के कुछ लोगों से बात करा दीजिये ।


उन्होंने बताया चिंतागुफा गांव सडक से काफी अंदर है और वहां संभवत: कोई फोन तो नहीं होगा पर हम कोशिश करते हैं और उन मित्रों का धन्यवाद कि कुछ दिनों बाद उन्होंने पीडित परिवार तो नहीं पर चिंतागुफा के कुछ ग्रामीणों
सुरक्षागत कारणों से इन ग्रामीणों के नाम मैं नहीं लिख रहा हूं पर उन्होंने मुझे बताया कि मेरी खबर गलत है । उन्होंने मुझे यह भी बताया कि मैं जो नाम बता रहा हूं कलमू दल्ला वह नाम तो सही है पर पर दूसरा ना मारवी मूरा नहीं बल्कि मारवी मूका है और उनको नक्सलियों ने खेती करने के कारण नहीं मारा ।



मैंने पूछा आपको यह कैसे मालूम है तो उनका तर्क था "आप हमारे गांव आकर देख लीजिये हमारे गांव के सारे किसान खेती कर रहे हैं इतना ही नहीं कलमू दल्ला और माड्वी मूका के घर के लोग भी खेती कर रहे हैं" ।फिर मैंने पूछा तो नक्सलियों ने कलमू दल्ला और माड्वी मूका को क्यों मारा? अखबारों में तो पुलिस ने यह बयान दिया है कि उनका पुलिस और सलवा जुडुम से कोई संबंध नहीं था ।




"चिंतागुफा में सभी को मालूम है कि कलमू दल्ला और माड्वी मूका पुलिस को दारू सप्लाई करते थे और वो पुलिस वालों के सा बैठकर पीते भी थे पर अंदरवालों ने उनको क्यों मारा ये तो नहीं मालूम ।चिंतागुफा में लगभग 800 लोग रहते हैं और यह सही है कि हमारे गांव से कोई भी सलवा जुडुम कैम्प में नहीं गया है पर सलवा जुडुम के लोग अक्सर हमको खेती न करने और कैम्प चलने के लिये कहते हैं। उन्होंने हमारे गांव में बहुत तोडफोड की है और बहुत लोगों को मारा पीटा है"।


इसके बाद मैंने इंडो एशियन न्यूज़ सर्विस के रायपुर संवाददाता को फोन किया कि यदि वे मुझे पहले हफ्ते में मारे गये 3 किसानों के नाम बता दें तो उनके गांव से भी इस खबर को चेक करने की कोशिश की जा सकती है । उनके पास वे नाम नहीं थे पर उन्होंने मुझे एक नई कहानी बताई । उन्होंने बताया भाजपा के प्रदेश मुखपत्र के ताज़े अंक में यह छपा है कि "शुभ्रांशु नक्सली समर्थक है और रायपुर तथा दिल्ली के अपार्टमेंट में रहने वाले ये नक्सल समर्थक नक्सलियों से भी अधिक खतरनाक हैं" ।


कठिन सवाल पूछने वाले सत्ताधारियों के बीच लोकप्रिय नहीं होते और भाजपा के मुखपत्र से सत्य पर आधारित पत्रकारिता की आशा करना तो थोडी ज़्यादती भी होगी पर छ्त्तीसगढ के पत्रकार मित्रों से यह अनुरोध रहेगा कि वे चिंतागुफा जाकर यह ज़रूर देखें कि वहां के ग्रामीणों ने दिल्ली के अपार्ट्मेंट में रहने वाले एक पत्रकार को बेवकूफ बनाया या नहीं ।नक्सलियों द्वारा किसी को पुलिस का मुखबिर बताकर मार दिये जाने की जितनी निंदा की जाए वह कम है पर इतना तो आप भी मानेंगे ही कि हम पत्रकार झूठ भी तो नहीं लिख सकते ...]

से मेरी फोन पर बात करवा दी ।
सुरक्षागत कारणों से इन ग्रामीणों के नाम मैं नहीं लिख रहा हूं पर उन्होंने मुझे बताया कि मेरी खबर गलत है । उन्होंने मुझे यह भी बताया कि मैं जो नाम बता रहा हूं कलमू दल्ला वह नाम तो सही है पर पर दूसरा नाम मारवी मूरा नहीं बल्कि मारवी मूका है और उनको नक्सलियों ने खेती करने केकारण नहीं मारा ।




मैंने पूछा आपको यह कैसे मालूम है तो उनका तर्क था "आप हमारे गांव आकर देख लीजिये हमारे गांव के सारे किसान खेती कर रहे हैं इतना ही नहीं कलमू दल्ला और माड्वी मूका के घर के लोग भी खेती कर रहे हैं" ।फिर मैंने पूछा तो नक्सलियों ने कलमू दल्ला और माड्वी मूका को क्यों मारा ? अखबारों में तो पुलिस ने यह बयान दिया है कि उनका पुलिस और सलवा जुडुम से कोई संबंध नहीं था ।



"चिंतागुफा में सभी को मालूम है कि कलमू दल्ला औरमाड्वी मूका पुलिस को दारू सप्लाई करते थे और वो पुलिस वालों के साथ बैठकर पीते भी थे पर अंदरवालों ने उनको क्यों मारा ये तो नहीं मालूम ।चिंतागुफा में लगभग 800 लोग रहते हैं और यह सही है कि हमारे गांव से कोई भी सलवा जुडुम कैम्प में नहीं गया है पर सलवा जुडुम के लोग अक्सर हमकोखेती न करने और कैम्प चलने के लिये कहते हैं। उन्होंने हमारे गांव में बहुत तोडफोड की है और बहुत लोगों को मारा पीटा है"।



इसके बाद मैंने इंडो एशियन न्यूज़ सर्विस के रायपुर संवाददाता को फोन किया कि यदि वे मुझे पहले हफ्ते में मारे गये 3 किसानों के नाम बता दें तो उनके गांव से भी इस खबरको चेक करने की कोशिश की जा सकती है । उनके पास वे नाम नहीं थे पर उन्होंने मुझे एक नई कहानी बताई ।



उन्होंने बताया भाजपा के प्रदेश मुखपत्र के ताज़े अंक में यह छपा है कि "शुभ्रांशु नक्सली समर्थक है और रायपुर तथा दिल्ली के अपार्टमेंट में रहने वाले ये नक्सल समर्थक नक्सलियों से भी अधिक खतरनाक हैं" ।कठिन सवाल पूछने वाले सत्ताधारियों के बीच लोकप्रिय नहीं होते और भाजपा के मुखपत्र से सत्य पर आधारित पत्रकारिता की आशा करना तो थोडी ज़्यादती भी होगी पर छ्त्तीसगढ के पत्रकार मित्रों से यह अनुरोध रहेगा कि वे चिंतागुफा जाकर यह ज़रूर देखें कि वहां के ग्रामीणों ने दिल्ली के अपार्ट्मेंट में रहने वाले एक पत्रकार को बेवकूफ बनाया या नहीं ।नक्सलियों द्वारा किसी को पुलिस का मुखबिर बताकर मार दिये जाने की जितनी निंदा की जाए वह कम है पर इतना तो आप भी मानेंगे ही कि हम पत्रकार झूठ भी तो नहीं लिख सकते ..
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